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लबों पे उसका नाम है, दिल में बसाई बात है,
अपूर्वा की ज़ुल्फ़ों में जैसे कोई रात है।
बड़े-बड़े वो आँखें हैं, जैसे कोई ख़्वाब हों,
हर इक नज़र में कैद वो, जादू की सौग़ात है।
नाक पे तिल है ऐसा कि चाँद भी शरमा गया,
वो एक कशिश, वो एक अदा, दिल की करामात है।
घर की थकन से टूटती, चुपचाप कुछ कहती है,
उसकी उदासी में छुपी, सौ दर्द की सौग़ात है।
कहती नहीं कुछ भी मगर, आंखों में है दर्द साफ़,
मुस्कान पीछे छुप गया, जो दिल की ज़रूरत है।
काश मैं कह सकूं उसे, “रुक जा, सँभल जा तू ज़रा,”
तेरे बिना ये घर नहीं, बस इक खाली बात है।